इंदर भोले नाथ....... आधुनिक हिंदी साहित्य से परिचय और उसकी प्रवृत्तियों की पहचान की एक विनम्र कोशिश : भारत
Saturday, August 8, 2015
"बस नही तो वो "ज़िंदगी"
वही छत वही बिस्तर..!
वही अपने सारे हैं......!!
चाँद भी वही तारे भी वही..!
वही आसमाँ के नज़ारे हैं...!!
बस नही तो वो "ज़िंदगी"..!
जो "बचपन" मे जिया करते थे...!!
वही सडकें वही गलियाँ..!
वही मकान सारे हैं.......!!
खेत वही खलिहान वही..!
बागीचों के वही नज़ारे हैं...!!
बस नही तो वो "ज़िंदगी"..!
जो "बचपन" मे जिया करते थे...!!
#मेरे_अल्फ़ाज़_इंदर
Acct- (IBN)
"सब कुछ बदल सा गया है."
इस क़दर उदासी इन फ़िज़ाओं मे पहले तो न थी...
इस क़दर बेरूख़ी इन हवाओं मे पहले तो न थी...
ये शाम जिसके आने से कभी दिल खिल उठा था...
इस क़दर खामोश ये पहले तो न थी.....
ये रात जिसका हर लम्हा कभी अपना सा लगा था..
इस क़दर अंजान ये पहले तो न थी....
इक तुम क्या गये ज़िंदगी से "इंदर"...
सब कुछ............................... बदल सा गया है......
#मेरे_अल्फ़ाज़_इंदर
Acct- (IBN)
"कभी पहेलू मे आओ तुम"
कभी पहेलू मे आओ तुम
मिलके तुम से बहुत सारी बातें करनी है...
कुछ अपनी कहनी है, कुछ तुम्हारी सुननी है...
मिलके तुम से बहुत सारी बातें करनी है...
फिर बातों-बातों मे यूँ ही रूठ जाना तुम...
फिर मैं तुम्हे प्यार से मनाया करूँगा....
रूठने-मनाने का सिलसिला यूँही दोहराते रहनी है...
मिलके तुम से बहुत सारी बातें करनी है...
कितने ख्वाब सुनहरे आँखों मे हमने सजाई है....
इंतेज़ार मे हमने राहों मे तेरी पलकें बिछाई है.....
कर के दीदार तुम्हारी, आँखों की प्यास बुझानी है....
मिलके तुम से बहुत सारी बातें करनी है...
कभी तो तुम आओगे "इंदर" सदियों से ये आस लगाई है...
ना तुम कभी आए, ना ही तुम्हारी कोई सदा आई है....
इंतेज़ार का ये सिलसिला यूँही बरकरार रखनी है......
कभी पहेलू मे आओ तुम
मिलके तुम से बहुत सारी बातें करनी है...
०२/०६/२०१५ -मेरे अल्फ़ाज़ "इंदर"
Acct- (IBN)
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