तुझे चाँद कहूं या आफताब कहूं,
होगी तुझ-सा कोई हूर नहीं…
है नूर भी फिका सा लगे,
पर तुझमे कोई गुरूर नहीं…
होगी तुझ-सा कोई हूर नहीं…
है नूर भी फिका सा लगे,
पर तुझमे कोई गुरूर नहीं…
…इंदर भोले नाथ
इंदर भोले नाथ....... आधुनिक हिंदी साहित्य से परिचय और उसकी प्रवृत्तियों की पहचान की एक विनम्र कोशिश : भारत
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