Monday, April 20, 2020

ग़ज़ल

चंद सांस लिये इक आस लिये
कुछ यादें   अपने   पास लिये

गम ए इश्क़  का सौगात लिये
इन आंखों में  कई   रात लिये

कुछ अनकहे    जज्बात लिये
गर्दिश  वाली    हालात  लिये

तेरे  शहर  से  अब गुजरते हैं
हम अश्कों की बरसात  लिये

... इंदर भोले नाथ

शेर ओ शायरी

तेरी हर इक बात मुझसे मेरी औक़ात पूछती है
मेरी तआरुफ़  के वासते  मेरी  जाति पूछती है

तुम  मिजाज़  रखते हो  शायद ऊंचे घराने का
मुफ़लिसी कहां  किसी से   औक़ात  पूछती है

...इंदर भोले नाथ

ग़ज़ल

क्या तड़प दिखाउं मैं तुम्हे
तन्हा   स्याह    रातों  का

यूँ  बेवज़ह हर घड़ी आना
मुसलसल  तेरी  यादों का

इक  वादा  रोज करते हैं
ये  सिलसिला मिटाने को

पर अक्सर  टुट  जाते  हैं  
ये वादे हैं महज़ बातों का

#इंदरभोलेनाथ
@InderBhole

ग़ज़ल

चरागों से कह दो ना बुझे इक आस बाकी है
धड़कनें भी हैं चल रही, अभी सांस बाकी है

कब से दबे हैं दिल में अल्फाजों का काफिला
कई  अनकहे  से वो  अभीं जज्बात  बाकी है

ये  तय  हुआ था कि,  आखिरी दीदार करेंगे
जरा ठहर जाओ अभीं,वो मुलाकात बाकी है

#इंदरभोलेनाथ
@InderBhole

#Corona@lockdown

वो  जिस्म है या कोई साया है, जो
चुपके से हर सय में उतर आया है

बदला हुआ है शहर का मिजाज़,वो
बनके  खौफ़ हर दिल में समाया है

मेहमान बन के शहर  में आया था
क्युं  बैठ गया  वो  हक जमाया है

बे दखल  कर के कोई भगाये इसे
इसने  दिल  को बहोत दुखाया है

#corona#lockdown
#इंदरभोलेनाथ

Wednesday, February 12, 2020

हां मैंने इश्क को जहन्नुम से भी बद्तर देखा है

मैंने अश्क़ों के समंदर संग अपना मुकद्दर देखा है
हां     मैंने इश्क को जहन्नुम से भी बद्तर देखा है

ज़िंदगी   गुजर    जाती है    इंतज़ार  में   अक्सर
हाँ      मैंने   इश्क़ में    हसर   इस  क़दर देखा है

इन  आंखों  से  नींद अब  काफ़ूर  सी हो  गई  है
के तेरी तलाश में मैंने इस क़दर दर ब दर देखा है

मिलते नहीं है ख़्वाबों में भी वो बिछड़ जाने वाले
हुए इंतज़ार मे बसर   कितने रह ए गुज़र देखा है

महज़ सांसों के चलने से जिंदगी जिंदा नहीं रहती
हाँ     मैंने   जीते जी  "इंदर" तेरा   क़बर  देखा है

© इंदर भोले नाथ

Monday, February 3, 2020

रियासत है गुंज रही गरीबों के चित्कारों से

सियासत नाच कर रही अमीरों के इशारों पे
रियासत है गुँज रही गरीबों के चित्कारों से

शांति और उन्नति का वो चमन रहा नहीं
आवाम बिखर रहा है अब देश के गद्दारों से

मुंह खोला जब भी उसने जहर ही उगाला है
आस्तीनों में सांप हम ने ही तो पाला है

आसरा दिया उनको हालत पे तरस खाकर
क्या पता था लुट जाएंगे नेकी के विचारों से

फुर्सत मिले तो देखना कभी इस गरीब खाने में
कैसे जी रहे हैं हम दो वक्त की रोटी कमाने में

इक तुम पे ही भरोसा था तुम भी उन जैसा निकले
कर अनदेखा किसानों को जा मिले साहूकारों से