इंदर भोले नाथ....... आधुनिक हिंदी साहित्य से परिचय और उसकी प्रवृत्तियों की पहचान की एक विनम्र कोशिश : भारत
Wednesday, November 7, 2018
Tuesday, November 6, 2018
Thursday, November 1, 2018
Saturday, August 11, 2018
वो मकाँ बाकी है…..
अबसारों पे अब भी दीद की निशाँ बाकी है
नाकाम-ए-इश्क़ मे अब भी इम्तेहाँ बाकी है
गुजर जाते हवाओं सा तेरे शहेर से “लेकिन”
जर्जर हुआ अब भी वो मकाँ बाकी है…..
नाकाम-ए-इश्क़ मे अब भी इम्तेहाँ बाकी है
गुजर जाते हवाओं सा तेरे शहेर से “लेकिन”
जर्जर हुआ अब भी वो मकाँ बाकी है…..
“इंदर भोले नाथ”
Absaron Pe Ab Bhi Did Ki Nishan Baki Hai
Nakam-e-ishaq Me Ab Bhi Intehaan Baki hai
Gujar Jate Hawaon Sa Tere Sheher Se “Inder”
Lekin Jarjar Hua Ab Bhi Wo Makaan Baki Hai…..
Nakam-e-ishaq Me Ab Bhi Intehaan Baki hai
Gujar Jate Hawaon Sa Tere Sheher Se “Inder”
Lekin Jarjar Hua Ab Bhi Wo Makaan Baki Hai…..
“Inder Bhole Nath”
Thursday, March 22, 2018
सफ़र ज़ारी रहा मेरा
मंज़िले मिलती रहीं लेकिन सफ़र ज़ारी रहा मेरा,
हुए मुख्तलिफ-ए-राह-ए-गुज़र लेकिन खबर जारी रहा मेरा…
हुए मुख्तलिफ-ए-राह-ए-गुज़र लेकिन खबर जारी रहा मेरा…
मुकम्मल ख़्वाब न हो शायद ये भी महसूस होता है
उम्मीद-ए-कारवाँ पे लेकिन नज़र ज़ारी रहा मेरा…
उम्मीद-ए-कारवाँ पे लेकिन नज़र ज़ारी रहा मेरा…
उन्हे ये इल्म न हो शायद शब-ए-महफ़िल मे जीने का
लेकिन सहरा मे भी जीने का हुनर ज़ारी रहा मेरा…
लेकिन सहरा मे भी जीने का हुनर ज़ारी रहा मेरा…
बेशक़ गुज़ारी है “इंदर” नई सुबहों की हर वो शाम
लेकिन गुज़रे हुए कल मे बसर ज़ारी रहा मेरा…
लेकिन गुज़रे हुए कल मे बसर ज़ारी रहा मेरा…
ख़्वाहिश अब न हो शायद राह-ए-मोहब्बत से गुजरने का
लेकिन वो इश्क़ का अब भी असर ज़ारी रहा मेरा…
लेकिन वो इश्क़ का अब भी असर ज़ारी रहा मेरा…
……इंदर भोले नाथ
Wednesday, March 21, 2018
मुखालिफत...
मुखालिफत पे उतर आया है दिल आज कल अपना,
मेरे दर्द से ज़्यादा उसकी यादों को तवज्जो देने लगा है….
मेरे दर्द से ज़्यादा उसकी यादों को तवज्जो देने लगा है….
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सोंख जाता है समंदर ये, बहुत प्रबल हो गया है खो कर जहाँ सारा पागल मुकम्मल हो गया है न आँधियों का डर रहा न अब बाढ़ से घबराता है लगता है द...
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कीचड़ में शनी धरा झींगुरों की आवाज कानों मे गूंजती हुई सांय सांय करती हुई काली रात एक तरफ मेंढकों के टर्राने की आवाज तो दूसरी तरफ सांपों...
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मंज़िले मिलती रहीं लेकिन सफ़र ज़ारी रहा मेरा, हुए मुख्तलिफ-ए-राह-ए-गुज़र लेकिन खबर जारी रहा मेरा… मुकम्मल ख़्वाब न हो शायद ये भी महसूस ...

