Sunday, March 13, 2016

बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है...

क्यूँ उदास हुआ खुद से है तूँ
कहीं भटका हुआ सा है,
न जाने किन ख्यालों मे
हर-पल उलझा हूआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
खोया-खोया सा रहता है
अपनी ही दुनिया मे,
गुज़री हुई यादों मे
वहीं ठहरा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
शीशा-ए-ख्वाब तो टूटा नहीं
तेरे हाथों से फिसल के,
जो आँखों मे टूटे ख्वाब लिए
यूँ रूठा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
क्यों उम्मीद किए बैठा है तूँ
वफ़ा की इस जमाने से,
यहाँ कीमत लगी है प्यार की
इश्क़ बिका हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
…इंदर भोले नाथ…
..(१३/०३/२०१६)


ज़िंदगी न हो उदास तूँ

ज़िंदगी न हो उदास तूँ,
तेरे पूरे अरमान कर देंगे…
हम वो माहिर परिंदे हैं,
जो तुफां मे उड़ान भर देंगे…
…इंदर भोले नाथ…


Friday, March 11, 2016

दिल सुलग सा रहा है

इस आज़र्दाह-ए-आलम का, क्या कहना “इंदर”,
बारिश मे भीग के भी दिल सुलग सा रहा है…
…इंदर भोले नाथ…
आज़र्दाह-व्याकुल

वो-प्यार याद आया...

वो-प्यार याद आया...

गुजरें जो गली से उसके,वो-दीदार याद आया
पलते नफ़रतों के दरमियाँ,वो-प्यार याद आया
आँखों से मिलने का वो इशारा करना उसका
फिर करना तन्हा मेरा,वो इंतेजार याद आया
शिकवे लिये लबों पे,बेचैन वो होना मेरा फिर
चुपके से लिपट के उसका,वो इज़हार याद आया
मिल के उससे दिल का,वो फूल सा खिल जाना
न मिलने पे होना खुद का,वो लाचार याद आया
यूँही चलते रहना वो,अपना मिलने का सिलसिला
कभी पतझड़ तो कभी वो बहार याद आया
हर इश्क़ की कहानी मुकम्मल हुई नहीं “इंदर”
हर शाम तन्हाई मे मुझे वो-यार याद आया
गुजरें जो गली से उसके,वो दीदार याद आया
पलते नफ़रतों के दरमियाँ,वो-प्यार याद आया
…इंदर भोले नाथ…


Friday, February 19, 2016

तुफां ने ली जो अंगड़ाई

तुफां ने ली जो अंगड़ाई
खत्म हर शाख हो गयें,
परिन्दे उड़ गएं शायद
घर बर्बाद हो गयें…!!
…इंदर भोले नाथ…

Tuesday, February 16, 2016

बसंत का मौसम


बसंत का मौसम
है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है,
हर दिल मे है उमंगे
हर लब पे ग़ज़ल है,
ठंडी-शीतल बहे ब्यार
मौसम गया बदल है,
हर डाल ओढ़ा नई चादर
हर कली गई मचल है,
प्रकृति भी हर्षित हुआ जो
हुआ बसंत का आगमन है,
चूजों ने भरी उड़ान जो
गये पर नये निकल है,
है हर गाँव मे कौतूहल
हर दिल गया मचल है,
चखेंगे स्वाद नये अनाज का
पक गये जो फसल है,
त्यौहारों का है मौसम
शादियों का अब लगन है,
लिए पिया मिलन की आस
सज रही “दुल्हन” है,
है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है…!!
…….इंदर भोले नाथ…….


“अब भी आता है”
ज़रा टूटा हुआ है,मगर बिखरा नहीं है ये,
वफ़ा निभाने का हुनर इस दिल को अब भी आता है…
तूँ भूल जाए हमे ये मुमकिन है लेकिन,
हर शाम मेरे लब पे तेरा ज़िक्र अब भी आता है…
हज़ारों फूल सजे होंगे महफ़िल मे तेरे लेकिन,
मेरे किताबों मे सूखे उस गुलाब से खुश्बू अब भी आता है…
न गुज़रेगी कभी तूँ इस रस्ते से लेकिन,
करना उम्मीद तेरे आने का हमे अब भी आता है…
ज़रा टूटा हुआ है मगर बिखरा नहीं है ये,
वफ़ा निभाने का हुनर इस दिल को अब भी आता है…
२७/०९/२०१० @ इंदर भोले नाथ…