Sunday, October 29, 2023

सुन ले तो अच्छा है दोबारा पुकार नहीं सकता
मैं, मजबूर हूँ आदत से  रट्टा  मार नहीं सकता

हाँ लाज़मी है हमसफर का सफर में होना,किन्तु
ऐसा नहीं है कि मैं सफ़र तन्हा गुजार नहीं सकता

© इंदर भोले नाथ
बागी बलिया उत्तर प्रदेश

Tuesday, May 16, 2023

रोने की तलब थी रोया न गया

रोने की तलब थी रोया न गया
तकिया अश्क़ों से भिगोया न गया

पुरी रात दिवारों से बातें की हमने
तेरी याद मे रात फिर सोया न गया

कम्बख्त दिल भी बंजर जमीं हो गया है
तेरे बाद फसल कोई बोया न गया

कैसे कपड़ों की तरह लोग बदलते हैं रिश्तें
हमसे तेरी खुशबू बदन से धोया न गया

भटकी है रूह भी उसकी तलाश में इंदर
अफसोस मर के भी चैन से सोया न गया

~ इंदर भोले नाथ
बागी बलिया उत्तर प्रदेश

Saturday, February 18, 2023

महाभारत युद्ध........

नृत्य काल कर रहा,भुजाओं में दो सर लिये
रक्त पी रही पिशाचनी हाथ मे खप्पर लिये
रणभूमि भी सनी हुई है रक्त की आगोश में
कुरुक्षेत्र भी खड़ा है शांत गोद में समर लिये

बाण सा है दौड़ रहा धमनियों का खून भी
विवेकपूर्ण भाव हैं तो जीत का जुनून भी
चेतना अचेत हुई रुदन और विलाप से
बारी बारी मिट रहे हैं पाप और पुण्य भी

हर कक्ष का यक्ष ब्याकुल और अधीर है
दूत जो हैं आ रहें मौत की खबर लिये
नृत्य काल कर रहा,भुजाओं में दो सर लिये
रक्त पी रही पिशाचनी हाथ मे खप्पर लिए 

कर्ण की ध्वजा गिरी अर्जुन के प्रहार से
दुर्योधन की गदा थकी भीम के हुँकार से
कुरु सैन्य छिन्न भिन्न किये नकुल और सहदेव ने
अधर्म दम तोड़ रहा धर्मराज की वार से

एक तरफ सच्चाई खड़ी तो एक तरफ जिद्द है
एक ओर हंसों की टोली दूजी ओर गिद्ध हैं 
दो सहोदर लड़ रहें एक दूजे के विनाश को
कर्ण ने आह्वान किया अर्जुन पे ब्रह्मास्त्र को 

हर दिशा शून्य शान्ति धरा और आकाश है
वायु भी अग्नि बरस रही कुरुक्षेत्र का भ्रमण किए
नृत्य काल कर रहा,भुजाओं में दो सर लिये
रक्त पी रही पिशाचनी हाथ मे खप्पर लिये

इच्छा मृत्यु का वरदान भी आज श्राप सिद्ध हो गयें 
गंगा पुत्र भीष्म भी आज अपनी दुर्दशा पे रो गयें 
ये कैसी गुरु दक्षिणा हुई ज्ञान के आशीष को
शिष्य ने धड़ से अलग किया गुरु के ही शीष को 

हर कोई विवश हुआ है इस धर्म युद्ध मे 
अपने ही खड़े हुए हैं अपनों के विरुद्ध मे 
भुजाओं को खबर है ये शस्त्रों को न ज्ञात है
जीत की अनुभूति में भी दिख रहा मात है

मेघ उमड़ रहा है अश्रू बन आसमां के नेत्र मे
धरा भी है चल पड़ी रक्त का समंदर लिए 
नृत्य काल कर रहा,भुजाओं में दो सर लिये
रक्त पी रही पिशाचनी हाथ मे खपर लिये

इंदर भोले नाथ
बागी बलिया उत्तर प्रदेश


Wednesday, October 5, 2022

भला कैसे हो सकता है

बगैर तेरे जिंदा भला कैसे हो सकता है
वो शख्स बेवफ़ा भला कैसे हो सकता है

कि जिसके आने से हुआ हो बवंडर का आगमन
वो मस्अला बेवजह भला कैसे हो सकता है

जो सितारा टिमटिमाता हो उसकी रौशनी लेकर
उसी चाँद से ख़फ़ा भला कैसे हो सकता है

कि जिसने खरीद लिया है मत दारू और पैसों से
वो नेता अच्छा इन्सां, भला कैसे हो सकता है

जिसके दर ओ दीवार ने तुम्हारा अतित संवारा हो
वो घर कभी मकां भला कैसे हो सकता है

जो रिश्ता खड़ा ही झूठ के बुनियाद पे हो "इंदर"
उस रिश्ते का भला, भला कैसे हो सकता है

©® इंदर भोले नाथ

बागी बलिया उत्तर प्रदेश

Tuesday, October 4, 2022

पूछ रहा धरती अम्बर,कि पूछे हर वासिंदा है
घात लगाये ब्याध है बैठा, सहमा हर परिंदा है
पूछ रही रावण की वेदना पूछ रहा असुर दल है
जला रहे हो रावण को क्या तुममें राम जिंदा हैं

वासिंदा- नागरिक
ब्याध- शिकारी

©® इंदर भोले नाथ
बागी बलिया उत्तर प्रदेश
 

 

मदमस्त चली पुरवाई है

पिय मिलन की आस में,सुध बुध सब बिसराइ है
बावरी हो चली बिरहन, मदमस्त चली पुरवाई है


आंगन से दहलीज तलक 
भ्रमण कई कई बार किया
कंगन,बिंदी,चूड़ी, काजल 
उसने सोलह श्रृंगार किया
आईने में देख छवि खुद की,खुद से ही शरमाई है
बावरी हो चली बिरहन, मदमस्त चली पुरवाई है


कागा से बात करन लगी
वो कोयल के अंदाज मे
वो मोरनी सी नाच रही
है पुरवाई की साज पे
पल्लू ओड़ रही सर पे, कभी आँचल लहराई है
बावरी हो चली बिरहन, मदमस्त चली पुरवाई है


देह सुखे बृक्ष की भाँति
धरा सी प्यासी प्यासी है
खबर मिली जब से आने की
वो कई रातों की जागी है
मिलन की बेला में भी सही वो सौ सौ बार जुदाई है
बावरी हो चली बिरहन, मदमस्त चली पुरवाई है


पलकें भी झपक नहीं रही
धड़कन की गति भी तेज हुई
रहे खड़ी तो पांव जले से हैं
बिस्तर काँटों की सेज हुई
मुंडेर से देख रही रस्ता, रस्ते पे आँख बिछाई है
बावरी हो चली बिरहन, मदमस्त चली पुरवाई है


इंदर भोले नाथ
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश

कैसे रहें हम प्रेम से वंचित

जागृत हुआ उन्माद हृदय में,कोटि-कोटि स्वप्न हैं संचित
जगत है नाचे इसकी धुन पे,कैसे रहें हम प्रेम से वंचित


तुम्हारा उत्तर न देना मन में सवाल जगाये बैठा है
नयन भी अश्रू का सागर विशाल बनाये बैठा है
उन्मुक्त उन्माद है सिने में पाबंदी रास नहीं आता
हृदय विरह क्रांति का मशाल जलाये बैठा है
धीरज-धैर्य-सामर्थ्य-सब्र, विवशता मे हो रहे खंडित
जगत है नाचे इसकी धुन पे,कैसे रहें हम प्रेम से वंचित


अथाह समन्दर सीमित है,कब,बांध लांघने आ जाये
असीमित स्वप्न नैनों में हैं, कब, हद्द बांधने आ जाये
पथ सदैव प्रतिक्षित हो, ध्वस्त न आस हृदय से हो
न ब्यर्थ नयन अश्रु हो, कब समन्दर मांगने आ जाये
नैन तृष्णित,हृदय अधीर, देह संग चैतन्य है दंडित
जगत है नाचे इसकी धुन पे,कैसे रहें हम प्रेम से वंचित


ब्याकुल-ब्यग्र-ब्यथित हो, सच ये कहावत करता है
कभी हाल जो था दीवानों का,ये भी यथावत करता है
कभी भाता है एकाकीपन,कभी अंधकार से लड़ता है
हृदय विरह विदारक हो नित-दिन बगावत करता है
जागृत हुआ उन्माद हृदय में,कोटि-कोटि स्वप्न हैं संचित
जगत है नाचे इसकी धुन पे,कैसे रहें हम प्रेम से वंचित


~ इंदर भोले नाथ
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
# 6387948060