Friday, July 3, 2020

कविता

"सुनो हे भारत माता"

तांडव करेंगे रूद्र बनकर 
दिखा देंगे जो शौर्य हमारा है 
सुनो हे भारत माता 
हमको सौगंध तुम्हारा है

राणा की वो भाल बन के 
तांडव वो कमाल बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का
चेतक सा वो चाल बन के 

मौत ही विकल्प एकमात्र बन के 
चौहान वंश का पात्र बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का
माँ शक्ति सा कालरात्रि बन के

अशोक सम्राट महान बन के
गुप्त वंश का आन बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का
मां भारती की शान बन के

भगत सिंह की बोली बन के 
खून की होली बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का
आजाद की गोली बन के

चाणक्य की नीति बन के
रघुकुल की रीति बन के 
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का 
महान विक्रमदित्य बन के

राम का धनुष बाण बन के 
सुदर्शन चक्र महान बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का 
झांसी की कृपाण बनके 

हिमालय सा पहाड़ बनके
सिंह सा दहाड़ बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का 
ब्रह्मास्त्र सा बाण बन के

चामुंडा  सा रक्त चाट के 
काली सा खप्पर लिये हाथ मे
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का 
कपाली सा नर मुंड काट के

यू पी वाला तेवर बन के 
मौत का जेवर बन के
हम विध्वंश करेंगे शत्रु का
वीर सिंह कुंवर बन के

हर तरफ गूंजा यही नारा है 
जर्रे जर्रे ने यही पुकारा है 
पीठ पे वार करने वालों सुनो 
अब सुनुश्चित् विध्वंस तुम्हारा है

तांडव करेंगे रूद्र बनकर 
दिखा देंगे जो शौर्य तुम्हारा है
सुनो हे भारत माता
हमको सौगंध तुम्हारा है
©इंदर भोले नाथ

जय श्री राम ही बोलेंगे

मुंह खोलने से पहले, हम हर शब्द तोलेंगे, किन्तु
झूठी कौम की आड़ में तुम सा जहर नहीं घोलेंगे

तुम्हारी चादरों से ढकी हम हर राज खोलेंगे,उचित है
वंशज हैं हम राम के, तो जय श्री राम ही बोलेंगे

मुंह खोलने से पहले..

जो  गुजर चुका है फिर  वही  इतिहास  दोहरायेंगे
पहले दंभ करेंगे चूर, फिर  तुम्हारी चिता जलायेंगे

जो पहचान है सदियों से वही हिंदुस्तान बनाएंगे
तुम्हारे  सीने पे  फिर से  वही  भगवा  लहराएंगे

खून से सनी वो राणा की भाल हो लेंगे, उचित है
वंशज हैं हम राम के, तो जय श्री राम ही बोलेंगे

मुंह खोलने से पहले..

महाभारत की युद्ध मे तुम्हारी निशां तक दिखी नहीं
राम चरित मानस में तुम्हारी किस्सा तक लिखी नहीं

हो कौन कहाँ से आये हो,किस ग्रह किस जहाँ से हो
जो कौड़ी के मोल भी, तुम्हारी  औकात  बिकी नहीं

इक बार नहीं सौ बार नहीं हर बार यही बोलेंगे,उचित है
वंशज  हैं  हम राम के,  तो  जय श्री राम  ही बोलेंगे


मुंह खोलने से पहले.. 

Friday, June 19, 2020

ज़िंदगी तुं बस माया ही रही


ए जिंदगी मैं तेरा
होकर भी तेरा न रहा
मौत की आगोश में
कोई सबेरा न रहा

जिसके हर ईट मे
अरमान पिरोये थें
वो सोने का महल
अब मेरा न रहा

तुं सच नहीं बस
माया ही रही
आत्मा से परे
काया ही रही

तेरे पीछे जब
उमर गंवाई है
तब जाकर हमें
समझ ये आई है

कैद था मैं संसार में
घर में और परिवार में
गुरुर में दिन गुजारे हैं
बस झूठी अहंकार में

वो जल रही धूं-धूं करके
जिसपे खतम ईमान किया
हो बेखबर इस रूह से
जीस बदन पर गुमान किया

आजाद हूँ तेरे
कैद से अब
मुझ पर अब
तेरा पहरा न रहा

ए जिंदगी मैं तेरा
होकर भी तेरा न रहा
मौत की आगोश में
कोई सबेरा न रहा

© इंदर भोले नाथ

मैं हैरान हूँ

मैं हैरान हूं
यह सोच कर
वो चैन से
कैसे सोता है
क्या इस दुर्दशा
को देख कर
उसका जमीर
नहीं रोता है

उसकी आंखों के
सामने कई यातनाएं
कई सितम हुएं
उस मासूम पर

वो नि:शब्द हुए
खामोश रहा
जुल्म होते देखता
रहा उस मजलूम पर

वो रखवाला
बन कर आया था
खुद ही चीरहरण
करने लगा
खुद ही ताले तोड़कर
करोड़ों का गमन
करने लगा

है कंस से ज्यादा
क्रूर वो
रावण से ज्यादा
अभिमानी है
शकुनी सा वो
धूर्त है
दुर्योधन सा अज्ञानी है

एक नहीं कई
रूप हैं उसके
छांव भी उसके
धूप भी उसके

वह नर भी है
मादा भी है
इन सब से
ज्यादा भी है

वो चोर भी है
वो साधु भी
वो सच भी है
वो जादू भी

उसकी करतूतों
की मनमानी है
वो चोर
खानदानी है

है बाप की
सत्ता समझ रहा
बस मजलूमों
पर ही गरज रहा

मैं क्या नाम दूँ?
कई नाम हैं उसके
बस घिनौने
काम हैं उसके

© इंदर भोले नाथ




मृगतृष्णा

मैं चलता रहा


मृगतृष्णा सा हो
चला है मन
न जाने किस
की खोज में
भटक रहा
उपवन उपवन

व्याकुल होकर
आतुर होकर
हर रिश्ते से
जा दूर होकर

मैं चलता रहा
बस चलता रहा
अब नींद से
काफूर हो कर

नगरे नगरे
द्वारे द्वारे
भटक रहा
मारे मारे

अंधियारे से
उजियारे से
कभी छाए बदरा
कारे कारे से

खुद से ही
खुद को ढूंढ रहा
मैं सच से
आंखें मूंद रहा

कभी सागर की
आस जगी मुझको
कभी प्यास बस
एक बूँद रहा

कभी बरस गया
बादल बनकर
कभी रेगिस्तां सा
तपता रहा

थक कर मैं
सो भी गया
पर ख्वाब तो
मुझमें जगता रहा

मैं चलता रहा
हाँ चलता रहा

© इंदर भोले नाथ
बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060


Monday, June 15, 2020

तुम्हारा  शहर  भी  कुछ-कुछ  मेरे शहर सा है
ऊँची इमारतों के दरमियाँ इक छोटा घर सा है

वही जलन वही द्वेष वही  खलिशपन है देखी
नफरतों के मंजर का यहां भी वही असर सा है

©इंदर भोले नाथ

हम चलते ही रहें बे-हिस हुए
फिर दिल में ना ख्वाहिश हुए

कभी रातों के साये में ढलें
कभी तपती धूप मे हैं जलें

सावन में जलें तपन में हैं गलें
हम हर मौसम चलते ही चलें

बेहिसाब चलें लाजवाब चलें
पन्ने से बन कर किताब चलें

टुटें फिर भी जा़हिर न हुआ
दबाये दिल में हैं अज़ाब चलें

गलियों में चलें शहरों में चलें
फूलों पे चलें पत्थरों पे चलें

आंखों में नमी की न कमी रही
दिल में भी उदासी थमी रही

हम बेबस हो लाचार चलें
हम यार चलें बेशुमार चलें

हम चलते ही रहें चलते ही रहें
रस्ते युं ही कटते ही रहें

खुदा से  दुआ  मांगू  वो भी  तुम्हारे लिए "इंदर"
अरे छोड़ो इससे अच्छा तो हमें मौत ही आ जाये

बे-हद  और  बे-हिसाब  है  ये
जो आँखों में पलते ख़्वाब है ये

बस यादें रही और दर्द रहा
अश्क़ों  से मौसम सर्द रहा

हाँ सबने देखी मुस्कान मेरी
जो अंदर ही अंदर मर्ज़ रहा

उम्मीद रही  कुछ  कर्ज़ रहा
हम निभाते गयें जो फ़र्ज़ रहा

न ख्वाब न कोई तमन्ना थी
न तेरे बाद ही कोई अर्ज़ रहा

जैसे भी हो दिल को भाने लगे हो
तुम आंखों से  नींदे चुराने लगे हो

अब ख्याल तुम्हारा हर घड़ी रहता है
मेरी नफ़स नफ़स में समाने लगे हो

एक हश्र है, एक आह है, दोनों  ही बेपनाह है
तुम छोड़ कर टूट गये, हम तोड़ कर टूट गयें

Tuesday, June 9, 2020

ग़ज़ल

ये कुछ दिनों से खुमारी बढ़ी जो इस क़दर है
क्यूँ जोश में है जवानी, क्यूँ बहेका ये उमर है

क्यूं हो रहे हैं बेखबर हम जमाने की हकीकत से
ये हमको भी पता है, ये तुमको भी खबर है

आशां नहीं है इतना ये जो इश्क की डगर है
है कांटो भरा ये रस्ता बड़ी मुश्किल ये रहगुजर है

मुकम्मल जो हो गया तो, जिंदगी संवर जाएगी
वर्ना जीने नहीं है देता ये जो गमे इश्क का सफर है

कई आशियां है उजड़े कई वीरान हुए घर हैं
है कांटो भरा ये रस्ता बड़ी मुश्किल ये रहगुजर है

कुछ इस कदर हुए हैं हम दोनों एक-दूजे के ऐसे
मैं तुझ में समा गया हूं, तुम मुझ में हुआ बसर है

@ INDER BHOLE NATH