Monday, May 4, 2020

गीत -ये शाम फिर वही पहचानी सी है

ये शाम फिर वही पहचानी सी है
आंखों में फिर वही कहानी सी है

रोज खामोशियों में गुजरते हैं पल
दास्तां इश्क़ की वही पुरानी सी है

ये शाम फिर…..

तुं मुझ में है  या  तुझ में हूँ मैं
आज तक ये समझ पायें न हम

खामोशी है या जुबानी सी है
मुझ में तेरी कोई निशानी सी है

 ये शाम फिर……..

अधूरे स्वप्न कुछ तुम्हारे भी हैं
ख्वाहिशें कुछ अधूरी हमारी भी है

तेरे दिल में भी हलचल तूफानी सी है
मेरी आँखों मे भी थोड़ी पानी सी है


ये शाम फिर वही पहचानी सी है
आंखों में फिर वही कहानी सी है

©इंदर भोले नाथ

Friday, May 1, 2020

ग़ज़ल

के   तेरे   बाद   कोई  असर  तो  रहे
मेरे  दिल  में  यादों  की  बसर तो रहे

मेरी  हर  शाम  गुजरे  इसी उम्मीद मे
के  तेरे  आने  की  कोई खबर तो रहे

तुमने  जो भुला दिये कहानी की तरह
किसी ने उसे रखा है निशानी की तरह

इस  जहाँ से परे कोई बे-खबर तो रहे
प्यासा कहीं गुमनाम इक शजर तो रहे

© इंदर भोले नाथ


Monday, April 27, 2020

कविता

हम चलते ही रहें बे-हिस हुए
फिर दिल में ना ख्वाहिश हुए

कभी रातों के साये में ढलें
कभी तपती धूप मे हैं जलें

सावन में जलें तपन में हैं गलें
हम हर मौसम चलते ही चलें

बेहिसाब चलें लाजवाब चलें
पन्ने से बन कर किताब चलें

टुटें फिर भी जा़हिर न हुआ
दबाये दिल में हैं अज़ाब चलें

गलियों में चलें शहरों में चलें
फूलों पे चलें पत्थरों पे चलें

आंखों में नमी की न कमी रही
दिल में भी उदासी थमी रही

हम बेबस हो लाचार चलें
हम यार चलें बेशुमार चलें

हम चलते ही रहें चलते ही रहें
रस्ते युं ही कटते ही रहें

©इंदर भोले नाथ

Friday, April 24, 2020

बागवानी

                      "बागवानी"

जो  विष फैली है हवाओं में वो, रग रग में बस जानी है
कुछ  इस  क़दर अशुद्ध हुएं हैं, कण कण और पानी है

इक वक़्त ऐसा आयेगा, श्वास लेना भी दूभर हो जायेगा
कटती गिरती हरियाली की हर आह कि सुनी कहानी है

जो  विष फैली है हवाओं में................................

ऊँची  इमारतों की  भूख  में, तुम इस क़दर हो चूर हुए
जो  ज़िंदगी है हम सब की, उसे काटने को मजबूर हुए

गुरुर ओ दम्भ तुम्हारी चूर करेगी, मन में उसने ठानी है
बस बाग नहीं,ये ज़िंदगी है,ये जो उजड़ रही बागवानी है

जो  विष फैली है हवाओं में, वो रग रग में बस जानी है
कुछ  इस  क़दर अशुद्ध हुएं हैं, कण कण और पानी है

©इंदर भोले नाथ














Monday, April 20, 2020

ग़ज़ल

चंद सांस लिये इक आस लिये
कुछ यादें   अपने   पास लिये

गम ए इश्क़  का सौगात लिये
इन आंखों में  कई   रात लिये

कुछ अनकहे    जज्बात लिये
गर्दिश  वाली    हालात  लिये

तेरे  शहर  से  अब गुजरते हैं
हम अश्कों की बरसात  लिये

... इंदर भोले नाथ

शेर ओ शायरी

तेरी हर इक बात मुझसे मेरी औक़ात पूछती है
मेरी तआरुफ़  के वासते  मेरी  जाति पूछती है

तुम  मिजाज़  रखते हो  शायद ऊंचे घराने का
मुफ़लिसी कहां  किसी से   औक़ात  पूछती है

...इंदर भोले नाथ

ग़ज़ल

क्या तड़प दिखाउं मैं तुम्हे
तन्हा   स्याह    रातों  का

यूँ  बेवज़ह हर घड़ी आना
मुसलसल  तेरी  यादों का

इक  वादा  रोज करते हैं
ये  सिलसिला मिटाने को

पर अक्सर  टुट  जाते  हैं  
ये वादे हैं महज़ बातों का

#इंदरभोलेनाथ
@InderBhole