Tuesday, February 5, 2019

गज़ल

                 
जब एहसास हो तेरे आने का लाज़मी है दिल का धड़कना भी,
मिलकर रुख्सत होने पर लाज़मी है दिल का तड़पना भी...

तेरे हर आह से हूं वाकिफ़ मैं मेरे हर दर्द की है खबर तुझे,
गर ख्वाहिश है इश्क मुकम्मल हो लाज़मी हैं दिल का बिखरना भी...

तेरा दिद हमें हो उस जगह तेरी आहट जहाँ मिलती न हो
इश्क़ जिश्म तक ही नहीं लाज़मी है रूह तक उतरना भी...

जब एहसास हो तेरे आने का लाज़मी है दिल का धड़कना भी,
मिलकर रुख्सत होने पर लाज़मी है दिल का तड़पना भी...

Friday, February 1, 2019

गज़ल

रहें गुमसुम कब तलक खुद में दम निकल जायेगा,
कोई गुफ्तगू कर ले पल दो पल दिल बहल जायेगा...

रहता नहीं ठहरा हुआ ये वक्त बदल जायेगा,
जब रू ब रू होगे आईने से ख्वाब रेत सा फिसल जायेगा...

युंही खामोश रह लेतें हम उम्र भर "इंदर",
युं इस कदर ना तोड़ता हमें खामोशियों का असर...

गुमनाम सा इक "दर्द" रूह तक ढ़ल जायेगा,
कोई गुफ्तगू कर ले पल दो पल दिल बहल जायेगा...

इंदर भोले नाथ

Saturday, January 26, 2019

गज़ल

कागज़ की कश्ती बनाके समंदर में उतारा था
हमने भी कभी ज़िंदगी बादशाहों सा गुजारा था,

बर्तन में पानी रख के ,बैठ घंटों उसे निहारा था
फ़लक के चाँद को जब, जमीं पे उतारा था,

न तेरा था न मेरा था हर चीज़ पे हक हमारा था
मासूम सा दिल जब कोरे कागज़ सा हमारा था,

बे-पनाह सी उमंगें थी,कई मंज़िल कई किनारा था
अब तन्हा जी रहे हैं हम तब महफ़िलों का सहारा था,

………..इंदर भोले नाथ.………..

गज़ल

जुड़ती रहे कड़ी से कड़ी हर लम्हा एहसासों का
चलता रहे सिलसिला यूँही मुलाकातों का....

रु ब रु तुम हो न हो, रहे जिक्र तुम्हारी यादों का
चलता रहे सिलसिला यूँही मुलाकातों का....

ख्वाब लिए इन आँखों में रोज गुजरती रातों का
लौ जैसी जलती बुझती सुलग रही जज्बातों का

कोई गिला नहीं तुमसे "इन्दर",है ऐतबार तुम्हारे वादों का
चलता रहे सिलसिला यूँही मुलाकातों का...

"इन्दर भोले नाथ"

मेरी शायरी...

आज ढ़ुढ़ते हो हमें फ़लक के सितारों में
कल नूर- ए - जमीं थे तब कद्र नहीं किये....

गज़ल

जाति मजहब के नाम पर हर रोज लुटते देखा है
इस सोने की चिड़िया को हर रोज टुटते देखा है

है देश कि अब परवाह किसे, कौन देश का अब गुणगान करे
जो खुद का ईज्जत निलाम किया, वो देश का क्या सम्मान करे

पागल थें वो दिवाने जो देश पे बलिदान हुए
मिट सी गई हस्ती उनकी, गुमनाम वो ईमान हुए

वो मसहूर हुए कुछ इस कदर, हर तरफ उन्ही का नाम है
जो देश के टुकड़े कियें, देश उन्ही का गुलाम है

मेरी शायरी...

इक तुहीं नहीं "इंदर" दिवाना उस कली का,
कल गुजरे जो गली से उनके,दिवान- ए- महफ़िल सजी मिली....