इंदर भोले नाथ....... आधुनिक हिंदी साहित्य से परिचय और उसकी प्रवृत्तियों की पहचान की एक विनम्र कोशिश : भारत
Saturday, April 2, 2016
Friday, April 1, 2016
ख्वाबों की तरह..
ख्वाबों की तरह रुख्सत सी हुई
“ज़िंदगी” तूँ जब अब्सारों से…
है धुंधला सा हुआ चिराग-ए-दिल
राह-ए-उल्फत के नज़ारों से…
…इंदर भोले नाथ…
merealfaazinder.blogspot.in
Whatsapp- 9736423320
“ज़िंदगी” तूँ जब अब्सारों से…
है धुंधला सा हुआ चिराग-ए-दिल
राह-ए-उल्फत के नज़ारों से…
…इंदर भोले नाथ…
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Friday, March 18, 2016
भर लूँ तुझे आगोश मे
भर लूँ तुझे आगोश मे
ऐ-वक़्त ज़रा तूँ रुक तो जा…
कल ही तो मीले थें हम दोनो
फिर जाने की जल्दी है क्या…
…इंदर भोले नाथ…
ऐ-वक़्त ज़रा तूँ रुक तो जा…
कल ही तो मीले थें हम दोनो
फिर जाने की जल्दी है क्या…
Tuesday, March 15, 2016
यादें...
स्कूल से हॉल्फ टाइम की छुट्टी मार के :-
पहले के सिनेमा घरों मे जाते ही वो बुकिंग काउंटर पे लंबी लाइनों के होने के बावजूद भी टिकेट ले लेना !
और अंदर जाते ही सन्नाटा सा छाए हुए उस हॉल मे मच्छरों का वो लगना, वो कोने मे गुटखें और पानों के लाल से धब्बों का होना, वो प्लास्टिक और लकड़ियों की कुर्सियों पे हल्का सा गदे का होना,वो हीरो की एंट्री और एक्सन सीनों पे सीटियों का बजना, वो इंटरवल टाइम मे जल्दी-जल्दी टॉयलेट जाते हुए फिर जल्दी-जल्दी लौट के अपनी सीट पे बैठना !
कसम से.....
आज भी ये एहसास दिलाता है कि इन (Theaters और Malls ) से कहीं ज़्यादा सुकून और मजेदार हुआ करता था !
पहले के सिनेमा घरों मे जाते ही वो बुकिंग काउंटर पे लंबी लाइनों के होने के बावजूद भी टिकेट ले लेना !
और अंदर जाते ही सन्नाटा सा छाए हुए उस हॉल मे मच्छरों का वो लगना, वो कोने मे गुटखें और पानों के लाल से धब्बों का होना, वो प्लास्टिक और लकड़ियों की कुर्सियों पे हल्का सा गदे का होना,वो हीरो की एंट्री और एक्सन सीनों पे सीटियों का बजना, वो इंटरवल टाइम मे जल्दी-जल्दी टॉयलेट जाते हुए फिर जल्दी-जल्दी लौट के अपनी सीट पे बैठना !
कसम से.....
आज भी ये एहसास दिलाता है कि इन (Theaters और Malls ) से कहीं ज़्यादा सुकून और मजेदार हुआ करता था !
वो बूढ़ी औरत…..
रोज सुबह ड्यूटी पे जाना रोज शाम लौट के रूम पे आना,ये रूटीन सा बन गया था, मोहन के लिये ! हालाँकि रूम से फैक्ट्री ज़्यादा दूर नहीं था, तकरीबन१०-१५ मिनट का रास्ता है ! मोहन उत्तर प्रदेश का रहने वाला है,करीब २ सालों से यहाँ (नोएडा) मे एक प्राइवेट फैक्ट्री मे काम कर रहा है ! रोज सुबह ड्यूटी पे जाना,शाम को लौट के कमरे पे आना ऐसे ही चल रहा था !
एक शाम जब मोहन ड्यूटी से ऑफ हो के जैसे ही फैक्ट्री से निकला कमरे पे जाने को,देखा बाहर तो जोरों की बारिश लगी हुई है ! १०-१५ मिनट इंतेजार करने के बावजूद भी जब बारिश न रुकी,तो मोहन दौड़ता हुआ कमरे पे जाने लगा ! तभी उसकी नज़र सड़क के किनारे एक छोटी सी पान की दुकान पे पड़ी,दुकान बंद हो चुकी थी ! और उसी दुकान से चिपक के एक बूढ़ी औरत बारिश से बचने के लिये खड़ी थी ! फिर भी वो भीग रही थी, और ठंड से कांप रही थी,क्योंकि बारिश के साथ-साथ ठंडी हवा भी चल रही थी ! न जाने मोहन के दिमाग़ मे क्या ख्याल आया,वो रुका और उस दुकान की तरफ बढ़ने लगा ! मोहन ने उस औरत से पूछा….माँ जी कौन हो आप..? और इतनी बारिश मे यहाँ क्या कर रही हो ..?
उस बूढ़ी औरत ने कहा…..बेटा,मेरा बेटा और मेरी बहू यहीं रहते हैं,इसी शहर मे, शादी के बाद जब से बहू को लेके यहाँ आया तब से न ही गाँव मे हम से मिलने आया न ही कोई खबर दी ! एकलौता बेटा है मेरा वो, दिल कर रहा था उसे देखने को इसलिए मैं खुद को रोक नहीं पाई और उससे मिलने चली आई ! जब उसकी शादी नहीं हुई थी, तब मैं अपने बेटे के साथ एक बार पहले भी आई थी यहाँ ! वही लेकर आया था मुझे, कहता था माँ खाना बनाने मे दिक्कत होती है,चल तूँ मेरे साथ ही रहना !
फ़ोन भी की थी मैने उसको, कि बेटा मैं आ रही हूँ वहाँ तुम्हारे पास ! जब मैं वहाँ पहुँची जहाँ वो रहता है, तो देखा कमरे मे ताला लगा हुआ है ! लोगों से पूछने पर पता चला कि वो बहू को लेकर उसके मायके गया है,बहूकी माँ की तबीयत खराब है उसे ही देखने गया है ! और बेटा…. जब अपना बेटा ही अपने कमरे मे ताला लगा गया है,तो फिर ये अंजान लोग क्या पनाह देंगे मुझे…..!
इतना सुनते ही मोहन के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा…..कैसा बेटा है अपनी माँ को इस हालत मे छोड़ सास को देखने गया है ! फिर मोहन उस बूढ़ी औरत से बोला…माँजी पास मे ही मेरा कमरा है, चलो आप वहीं रह लेना जब तक आप के बेटे और बहू नहीं आ जाते !
……………………………………………………….ख़त्म………………………………………………………………….
लेखक- इंदर भोले नाथ…
…..(१५/०३/२०१६)
उस बूढ़ी औरत ने कहा…..बेटा,मेरा बेटा और मेरी बहू यहीं रहते हैं,इसी शहर मे, शादी के बाद जब से बहू को लेके यहाँ आया तब से न ही गाँव मे हम से मिलने आया न ही कोई खबर दी ! एकलौता बेटा है मेरा वो, दिल कर रहा था उसे देखने को इसलिए मैं खुद को रोक नहीं पाई और उससे मिलने चली आई ! जब उसकी शादी नहीं हुई थी, तब मैं अपने बेटे के साथ एक बार पहले भी आई थी यहाँ ! वही लेकर आया था मुझे, कहता था माँ खाना बनाने मे दिक्कत होती है,चल तूँ मेरे साथ ही रहना !
फ़ोन भी की थी मैने उसको, कि बेटा मैं आ रही हूँ वहाँ तुम्हारे पास ! जब मैं वहाँ पहुँची जहाँ वो रहता है, तो देखा कमरे मे ताला लगा हुआ है ! लोगों से पूछने पर पता चला कि वो बहू को लेकर उसके मायके गया है,बहूकी माँ की तबीयत खराब है उसे ही देखने गया है ! और बेटा…. जब अपना बेटा ही अपने कमरे मे ताला लगा गया है,तो फिर ये अंजान लोग क्या पनाह देंगे मुझे…..!
लेखक- इंदर भोले नाथ…
…..(१५/०३/२०१६)
Sunday, March 13, 2016
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है...
क्यूँ उदास हुआ खुद से है तूँ
कहीं भटका हुआ सा है,
न जाने किन ख्यालों मे
हर-पल उलझा हूआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
खोया-खोया सा रहता है
अपनी ही दुनिया मे,
गुज़री हुई यादों मे
वहीं ठहरा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
शीशा-ए-ख्वाब तो टूटा नहीं
तेरे हाथों से फिसल के,
जो आँखों मे टूटे ख्वाब लिए
यूँ रूठा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
क्यों उम्मीद किए बैठा है तूँ
वफ़ा की इस जमाने से,
यहाँ कीमत लगी है प्यार की
इश्क़ बिका हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
कहीं भटका हुआ सा है,
न जाने किन ख्यालों मे
हर-पल उलझा हूआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
अपनी ही दुनिया मे,
गुज़री हुई यादों मे
वहीं ठहरा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
तेरे हाथों से फिसल के,
जो आँखों मे टूटे ख्वाब लिए
यूँ रूठा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
वफ़ा की इस जमाने से,
यहाँ कीमत लगी है प्यार की
इश्क़ बिका हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
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