Friday, February 25, 2022

आँख जम के बरस......

तन सुलग रहा है आज शाम,  के आँख  जम के बरस
मुझे ढक रहा है किसी का नाम,के आँख जम के बरस

के बरस  बड़ी देर से  फिर वही  टीस उठी थी दिल में
हाँ  अब  मिल रहा है आराम, के आँख जम के बरस 

तोहमत लगाई थी किसी ने के मैं पत्थर का हो गया हूँ
झूठा  हो रहा है  हर इल्जाम, के आँख जम के बरस
 
 
 
© इंदर भोले नाथ
बाबा भृगु की नगरी
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060



 

तेरी कहानी है......

खामोश शाम प्याल-ए-जाम और तेरी कहानी है
तेरी   तस्वीर   तेरा नाम   और   तेरी कहानी है

एक  डर है    मैं  मेरा  वज़ूद  कहीं   गंवा न दूं
सर से पाँव तक तुं ही तमाम और तेरी कहानी है

मैं मालिक हूँ मेरी मर्जी का ,मेरा कुछ भी तो नहीं
तेरा  सफर   तेरा मकाम   और   तेरी कहानी है


© इंदर भोले नाथ
बाबा भृगु की नगरी
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060



लानत है.........

मतलबी रिश्तों की यारी, लानत है
है ये कैसी दुनियादारी, लानत है

डँसते हैं,पर दूध पिलाना जायज भी
है ये कैसी जिम्मेदारी , लानत है

वहाँ हुजूर अटरिया रंभा उर्वशी नाचे 
यहाँ जनता फिरे मारी मारी, लानत है
 
 
© इंदर भोले नाथ
बाबा भृगु की नगरी
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060
 

शेर

1-
 
ये कौन आया कि फिर नई कहानी दे दी
मुझ मे  फिर  वही शौक़  पुरानी दे दी

दिल अंकुरित हो रहा है किसी दाने सा
कि सुखी ख्वाहिशों को फिर पानी दे दी

2-

बिन यादों के गुजरे शाम, ये हो नहीं सकता
न दुआ न कोई सलाम, ये  हो नहीं सकता

गर होने पे आये तो रूह जिस्म से जुदा कर दूँ
पर दिल से मिटा दूँ तेरा नाम ये हो नहीं सकता
 

© इंदर भोले नाथ
बाबा भृगु की नगरी
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश

मैं चलता गया

कि मैं चलता गया वो बुलाता गया
इक चेहरा यूँ मुझ को लुभाता गया

लत्त् ऐसी लगी उसमे खोने की मुझको
मैं खुद को ही खुद से भुलाता गया

परिंदा खाबों का बैठा पलकों पे कभी
कोई पत्थर से उसको उड़ाता गया

मैं उड़ानों की सफर पे था बेशक मगर
वो बारिस वो कश्ती याद आता गया
 
 

© इंदर भोले नाथ
बाबा भृगु की नगरी
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060






Wednesday, December 15, 2021

दिल तो तेरे इश्क़ में फिदा रहा, अब जां भी तेरे हवाले है

हर भोर  सुहानी होगी, हर शाम  दीवानी होगी
जिस रोज तुम्हारे सदके मे, बे-खौफ जवानी होगी

कतरे कतरे पे  हक है तेरा  सांसों पे तेरी हुकूमत है
दिल तो तेरे इश्क़ में फिदा रहा, अब जां भी तेरे हवाले है

ऐ वतना बे तेरी मिट्टी का 
नशा ही कुछ निराला है
चढ़ता जाता है और भी ये
जब जब खुद को संभाला है

जिस्मों से रूह तलक खुद को
तेरी सदके मे है उड़ेल दिया
जो था तेरा तुझको अर्पण
मिट्टी से मिट्टी का मेल किया

रूह तेरे आंचल मे सिमटा, तन पे  तिरंगा डाले हैं
दिल तो तेरे इश्क़ में फिदा रहा, अब जां भी तेरे हवाले है

जब यादों की बारिस होगी
मैं बन बुँदे तुम्हें भिगाउँगा
खेतों में बन के खुशबू सा
मैं फसलों मे लहाराउंगा

अमर होती है शहीदी चोला
मरने कहाँ ये देती है
तुम जब भी लोगे नाम मेरा
मैं हर दफा जी जाऊंगा

धूल भभूति सा सजा तन पे, तेरे रंग में रंगने वाले हैं
दिल तो तेरे इश्क़ में फिदा रहा, अब जां भी तेरे हवाले है

वो आन फिर वो आन नहीं
जो तुझ पे हो कुर्बान नही
जो दौड़ रहा है नश् नश् मे
उस लहू पे फिर अभिमान नहीं

धर्म नहीं मजहब नहीं
छोटा या बड़ा औकात नहीं
सब डूबे हैं एक ही रंग में
शहीदों की कोई जाति नहीं

कर लिया नशा जो शहादत का फिर कहां संभलने वाले हैं
दिल तो तेरे इश्क़ में फिदा रहा, अब जां भी तेरे हवाले है

~ इंदर भोले नाथ
बागी बलिया उत्तर प्रदेश
#6387948060

Saturday, July 24, 2021

रक्त मे घोल रही

कण कण अपनी मिट्टी का, है रक्त मे घोल रही
सुनो, हे  वीर धरा के  माँ  धरती तुम से बोल रही

गाड़, ध्वज, तुम  छाती पर, जंग का  ऐलान करो
क्षणिक भर विलम्ब रहित सहर्ष तुम बलिदान करो
दहल उठे कलेजा रिपु का सिंह सा व्याख्यान करो
उठे शस्त्र जब भी हाथों मे युद्ध तुम घमासान करो

भाल बवाल करे ऐसा  लगे राणा की जवानी हो
खड़ग की चाल मे फिर वही झाँसी वाली रानी हो
अस्त्र-शस्त्र नये हो किंतु युद्ध वही पुरानी हो,लगे
वीर शिवाजी की फिर से  जाग  उठी निशानी हो

बरसो लावे की भाँति ज़ुल्म और अत्याचारों पर
टूट पड़ो तुम शेर की मानिंद  देश के  गद्दारों पर
हाथ मिलाना बारूदों से, शोलों से घबराना मत
याद रहे  खानदानी पेशा  चलने का  अंगारों पर

हल्दी घाटी, तराइन का  युद्ध  फिर दोहरा डालो
पृथ्वीराज और राणा का कौशल फिर दिखा डालो
भूल गया है शायद दुश्मन याद फिर दिला डालो
मिट्टी की मोह किये बैठा है मिट्टी मे उसे मिला डालो

कुछ बनना है फिर आशिक क्यूँ, टीपू की तलवार बनो
रांझा मजनू फिर कभी,अभी अशोक और बिन्दुसार बनो
बहुत हुई अब प्रेम की भाषा, अब  गीता का सार बनो
काल डरे  जिस महाकाल से वही रुद्र का अवतार बनो 

रचो इतिहास फिर वही जो पुरुखों ने कभी रचाई थी
बलिदानी की परिभाषा उन्होने ही तो हमें सिखाई थी      
तिलक सुशोभित ललाट पर हवन कुंड की ज्वाला हो
विजय जश्न यूँ हो के गले मे नर मुंड की माला हो

नाच करे पिसाचिनी रण मे,जब जब तुम प्रहार करो
रक्त की नदियाँ बह निकलें,ऐसा तुम नरसंहार करो

~ इंदर भोले नाथ
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060