Saturday, July 24, 2021

रक्त मे घोल रही

कण कण अपनी मिट्टी का, है रक्त मे घोल रही
सुनो, हे  वीर धरा के  माँ  धरती तुम से बोल रही

गाड़, ध्वज, तुम  छाती पर, जंग का  ऐलान करो
क्षणिक भर विलम्ब रहित सहर्ष तुम बलिदान करो
दहल उठे कलेजा रिपु का सिंह सा व्याख्यान करो
उठे शस्त्र जब भी हाथों मे युद्ध तुम घमासान करो

भाल बवाल करे ऐसा  लगे राणा की जवानी हो
खड़ग की चाल मे फिर वही झाँसी वाली रानी हो
अस्त्र-शस्त्र नये हो किंतु युद्ध वही पुरानी हो,लगे
वीर शिवाजी की फिर से  जाग  उठी निशानी हो

बरसो लावे की भाँति ज़ुल्म और अत्याचारों पर
टूट पड़ो तुम शेर की मानिंद  देश के  गद्दारों पर
हाथ मिलाना बारूदों से, शोलों से घबराना मत
याद रहे  खानदानी पेशा  चलने का  अंगारों पर

हल्दी घाटी, तराइन का  युद्ध  फिर दोहरा डालो
पृथ्वीराज और राणा का कौशल फिर दिखा डालो
भूल गया है शायद दुश्मन याद फिर दिला डालो
मिट्टी की मोह किये बैठा है मिट्टी मे उसे मिला डालो

कुछ बनना है फिर आशिक क्यूँ, टीपू की तलवार बनो
रांझा मजनू फिर कभी,अभी अशोक और बिन्दुसार बनो
बहुत हुई अब प्रेम की भाषा, अब  गीता का सार बनो
काल डरे  जिस महाकाल से वही रुद्र का अवतार बनो 

रचो इतिहास फिर वही जो पुरुखों ने कभी रचाई थी
बलिदानी की परिभाषा उन्होने ही तो हमें सिखाई थी      
तिलक सुशोभित ललाट पर हवन कुंड की ज्वाला हो
विजय जश्न यूँ हो के गले मे नर मुंड की माला हो

नाच करे पिसाचिनी रण मे,जब जब तुम प्रहार करो
रक्त की नदियाँ बह निकलें,ऐसा तुम नरसंहार करो

~ इंदर भोले नाथ
बागी बलिया, उत्तर प्रदेश
#6387948060

Thursday, July 22, 2021

दर्पण

दर्पण देख शरमाने लगे हो,शायद
तुम पे निखार अब आने लगा है

घंटों तक पास बैठे रहते हो उसके
आईना भी तुम से बतियाने लगा है

बारिस मे छत पे नहा भी रहे हो
सावन, तुम्हें रास आने लगा है

मिलना भी है और खामोश रह कर
नज़र अब मोहब्बत जताने लगा है

आँखों मे काजल और पैरों मे पायल
समीज़ कंधे पे दुपट्टा सजाने लगा है


हाय  ये यौवन तुम पर क्या  आया
शहर  है के महफ़िल सजाने ल्गा है


 ~ इंदर भोले नाथ

Monday, May 17, 2021

गिरते  संभलते  कदमों  के  थकान कह रहे हैं
घर घर नहीं रहा,लौट जाओ, मकान कह रहे हैं

कोई पहले भी गुजरा है यहाँ से मुझ-सा बे-घर हुआ
ये   रास्ते  मे  पड़े हुए सामान  कह  रहे हैं

दीवाली मे तेल ब्यर्थ,होली मे गुलाल है ब्यर्थ होता
ऐसा  नये  जमाने के  नये  इंसान कह रहे हैं

कभी, दो रोटी भी न दी किसी ग़रीब को, लेकिन 
वो  लोग भी खुद को अब  भगवान कह रहे हैं

एक उँची जाति की अस्थियाँ एक शूद्र से जा मिली
ये  आँखों  देखा  हाल  श्मशान  कह  रहे हैं 

वो दुआ है रोज करतें कोई अर्थी उस गली से न गुज़रे
ये  बात कफ़न बेचने  वाले  दुकान कह रहे हैं 

- इंदर भोले नाथ 

Friday, May 14, 2021

मरुस्थल हो गया है

सोंख जाता है समंदर ये, बहुत प्रबल हो गया है  
खो कर जहाँ  सारा  पागल मुकम्मल हो गया है

न आँधियों का डर रहा न अब बाढ़ से घबराता है
लगता है  दिल तुम्हारे बाद मरुस्थल  हो गया है

- इंदर भोले नाथ
बागी बलिया,उत्तर प्रदेश
# 6387948060
धन्यवाद

इसे मौत दे दी जाय

दिल इश्क़ का गुनहगार है  इसे मौत दे  दी जाय
कम्बख़त इसी का  हक़दार है इसे मौत दे दी जाय

यूँ  भी  मर मर के जी रहा है,ज़िंदा  कहाँ है ये
इस क़दर जीना भी बेकार है इसे मौत दे दी जाय 

बहुत गुज़ारिश करेगा तुम से हज़ारों मिन्नते करेगा
मगर  सुनती कहाँ सरकार है इसे मौत दे दी जाय

गर्दिश मे कश्ती आ फँसी है और मुस्करा रहा है वो
ऐसे प्यार पे  धिक्कार है  इसे  मौत दे  दी जाय 

अब अगर बख़्श दोगे "इंदर"तो बग़ावत ही करेगा ये
इसके  सर पे खून सवार है, इसे  मौत दे दी जाय

- इंदर भोले नाथ

तेरी  गली मे आउँ और रुसवा हो जाउँ    
इससे  बेहतर  है कि  मै  मर ही जाउँ



 

Wednesday, April 28, 2021

क़तरा क़तरा हवा मे गुजर जाने दे 
जिस्म से रूह तलक उतर जाने दे

मैं भी आगाज़ -ए- वफ़ा ढूंढता हूँ
तूँ भी अब खुद को सुधर जाने दे

@ इंदर भोले नाथ