वो जून कि गर्मी, वो पीपल का साया वो यारों की टोली, वो रिश्तों का माया वो मिट्टी का घरौंदा, वो खपरैलों का छत लिए सोंधी सी खुश्बू, वो काग़ज़ का ख़त
वो ममता की लोरी, वो ख्वाबों की चोरी वो सांझ की बेला, वो चंदा चकोरी कोई मुझसे पूछे, क्या मैने है खोया इक मासूम बच्चा, वो बचपन गँवाया,,
कहाँ मिलता वो गुजरा पल,ये मुझको बता दो तुम मैं सब कुछ रख दूं गिरवी, वो वक़्त दिला दो तुम बहुत रोएँ जवां होके,तन्हाई मे छुप-छुप के,फिर जियें खुलके हर इक लम्हा,बचपन से मिला दो तुम अहम की ज़िद मे हमने ब्यर्थ जीवन गँवाया है हमें अपनों ने खोया है,हमने अपनों को भुलाया है किमत अमुल्य होती है, इक मुस्कान का, लेकिन ये न उनको समझ आई, न हमने समझ पाया है ज़िम्मेदारियों के भंवर मे खुद को फसा रखा है कई दर्द सिने मे हमने, अपने छुपा रखा है जो कभी देखा था मैने, फ़ुर्सत के आलम मे वो ख्वाब आँखों मे हमने अब तक बसा रखा है वफ़ा की चाह मे कभी, गुजर गया सभी हद से बहुत लाचार होता हूँ, अब जो मिलता हूँ,मैं खुद से मिले हैं दर्द बेशुमार, वफ़ा की राह लेकिन कोई शिकायत नहीं मेरी है, ऐ-ज़िंदगी तुम से खुद ही फँसे भंवर मे, तुम्हे हम क्या पनाह देंगे साहिल पे आ लगें जब, तुम्हारे काम आ सकेंगे थोड़ा इंतेज़ार कर लो, गर मुझ पे ऐतवार हो साथ चल ना सकें तो, तुम्हे मंज़िल दिखा देंगे अब इल्तिज़ा यही है, के कोई इक़्तिज़ा न हो इंतेज़ार-ए-यार का फिर,कोई सिलसिला न हो गुजर रहे हैं सम्भल के,रह-ए-उल्फ़त की गली से अब इश्क़ के सफ़र में फिर तुम-सा कोई बेवफा न हो लफ्ज़ उर्दू हैं मेरे लेकिन, रगों मे हिन्दी समाई है, हूँ वंशज राम का लेकिन, रहीम मेरा ही भाई है, रंग एक सा दिखा है, सभी के, लहू का लेकिन कोई कहता मैं सिख हूँ कोई कहता ईसाई है... सदाये उनकी भी आती है,जो दुनिया से चले जाते हैं, कभी यादों के ज़रिये, तो कभी ख्वाबों के ज़रिये, कभी जो लड़खड़ाएँ हम,वो हौसला बढ़ाते हैं कभी यादों के ज़रिये, तो कभी ख्वाबों के ज़रिये, ना तुम रहे हम मे, ना अपने आप सा हम हैं ये आखरी मुलाकात का गम है,तन्हा रात का गम है रो लेते हैं जी भर के बारिश मे आज कल ये बरसात का मौसम है किसी की याद का मौसम है ढोंग रिवाजों का फैला,झूठी रस्मों का बोलबाला है झूठ के माथे चंदन है, हुआ सच का मुँह काला है करोड़ों का घोटाला कर भी,ग़रीबों का छीना नीवाला है माथे पे चंदन घिस घिस के, चोर बना रखवाला है लुटेरे हो तुम पीढ़ी दर, तुम्हे बस लूटना ही आता है मनाना तुम कहाँ सीखे, तुम्हे बस रूठना ही आता है अहंकार की दंभ मे तुम, चूर-चूर हो लेकिन सत्ते की लालच मे तुम्हे झुकना भी आता है..
फन्ना हुई कस्ती मेरी,मेरे आसूओं मे डूबकर, कुछ इस क़दर इश्क़ में रुलाया गया हूँ मैं... उड़ने लगा हूँ आज-कल फिजाओं मे राख-सा, कुछ इस क़दर गम-ए-इश्क़ में जलाया गया हूँ मैं... कब रहा है शौक़ मुझे,मयकदे और ज़ाम का, मैं पीता नहीं हूँ "इंदर", पिलाया गया हूँ मैं... न मैं रहा दिल में तेरे न मेरे यादों का साया है, कुछ इस क़दर ज़ेहन से तेरे भुलाया गया हूँ मैं मैं तोड़ चला था रिश्ता कब का गमों के बज़्म से, आज फ़रमाइश पे दिलजलों के बुलाया गया हूँ मैं..... .......इंदर भोले नाथ
"तुम्हे जाना तो खुद पे हमें तरस आ गया, तमाम उम्र यूँही हम खुद को कोसते रहें"............
"गुलज़ार गली" यही नाम था उस गली का.... मैने कभी देखा नहीं था बस सुना था, हर किसी के ज़ुबान पे बस उसी गली का चर्चा रहता "गुलज़ार गली" | तकरीबन डेढ़ महीना हुआ होगा मुझे यहाँ आए हुए, इस डेढ़ महीने मे ऐसा कोई भी दिन नहीं था, जिस दिन मैने उस गली का ज़िक्र न सुना हो | किसी न किसी के ज़ुबान से पूरे दिन मे 2 या 3 बार तो सुन ही लेता था उस गली का नाम "गुलज़ार गली" | आख़िर क्या है उस गली मे आख़िर क्यों इतनी मसहूर है वो गली जो हर कोई उस गली का चर्चा करता रहता है | मैने कभी किसी से पूछा नहीं,सोचा खुद ही किसी दिन जाकर देख लेंगे आख़िर क्या है उस गली में और क्यों इतनी मसहूर है वो गली | दोस्तों ये कहानी उस गली की है जो हर रोज, शाम होते ही किसी नई नवेली दुल्हन की तरह सज जाया करती थी| वो गली जो किसी जन्नत से कम न थी,वो गली जो निगाह को किसी एक जगह ठहरने न देती थी,वो गली जो पलकों को झपकने न देती थी,वो गली जिसे देख दिल धड़कने लगता था,वो गली जिसने लाखों अफ़साने बनाए हुए थें,वो गली जिसने कई दर्द छुपाए हुए थे | वो गली जिसके हर धड़कन से बस यही सदा आती थी........
"कई आह बेचते हैं,हम हो लाचार बेचते हैं, वो ज़िस्म खरीदते हैं,मगर हम प्यार बेचते हैं"... क़हानी सुनाने की धुन मे दोस्तों मैं आप सब को अपना परिचय बताना भूल गया | मेरा नाम सुशील मिश्रा है मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ | मैने हिन्दी से स्नातक किया हुआ है आगे भी पढ़ना चाहता था,मगर पिताजी की हुई अचानक निधन के कारण पूरे घर परिवार की ज़िम्मेदारी मेरे उपर आ गई | क्यों कि भाइयों मे सबसे बड़ा मैं ही था | दो भाई और एक बहन की ज़िम्मेदारी मेरे उपर ही आ गई इसलिए मैं आगे नहीं पढ़ पाया,और नौकरी की तलाश मे यहाँ (******) मे अपने एक रिश्तेदार जो रिश्ते में मेरे भैया लगते थे उन्ही के पास आ गया | उन्ही की मदद से मुझे यहाँ (******) मे एक प्राइवेट फर्म मे काम मिल गया सुपरवाइजरी का |