Wednesday, June 22, 2016

कहीं डूबा है कोई यादों मे…

कहीं जख्म है नासूर बनें,कहीं समंदर बसा है आँखों मे,
कहीं तन्हा हुआ सा है कोई,कहीं सुलग रहा कोई रातों मे…
कुछ इस क़दर बेताब हुए, दीवानें राह-ए-उल्फ़त मे,
कहीं जीना कोई भूल बैठा, तो कहीं डूबा है कोई यादों मे…
…इंदर भोले नाथ…
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वीरानो में बना बैठे हैं…

कम्बख़्त ये तन्हाई भी न
कुछ इस क़दर हमें अपना बना बैठी है, के
इसका बसेरा मुझमे नहीं, हम
अपना आशियाना ही वीरानो में बना बैठे हैं…
…इंदर भोले नाथ…
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ये शिकायत भी है…

ये शिकायत भी है उनका के हम उन्हे याद नहीं करते,
और अपनी हिचक़ियों का कुसूरवार भी हमें बताते हैं…
…इंदर भोले नाथ…
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Monday, June 20, 2016

जुनून-ए-इश्क़

जुनून-ए-इश्क़ का दस्तूर भी अजीब है,
जो कभी अपना था ही नहीं,उसे गैर नहीं मानता…
…इंदर भोले नाथ…
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मिट्टी के घरौंदे…IBN

उसकी हर एक बूँद से पिघलते
देखा है मैने मिट्टी के उन घरौंदों को…
जिस बरसात की आरज़ू पत्थरों के
महल हर रोज किया करते हैं…..
…इंदर भोले नाथ…
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Sunday, June 5, 2016

Saturday, May 7, 2016

अब ज़िंदगी संवर जाने दे…

ऐ-वक़्त है गुज़ारिश,अब निखर जाने दे
गमों की इन आँधियों को,अब गुजर जाने दे
ख्वाहिश सदियों की तुझसे,रखता नहीं है “इंदर”
चन्द लम्हों मे ही सही,अब ज़िंदगी संवर जाने दे…
…इंदर भोले नाथ…
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