इस तन्हाई मे कुछ....तो बात है,
न जाने क्यूँ लगे....कोई साथ है...
सदियों से ढूंढते रहें,जिसे दर-बदर,
बनके साया वो चली,हर पहर साथ है...!!
न जाने क्यूँ लगे....कोई साथ है...
सदियों से ढूंढते रहें,जिसे दर-बदर,
बनके साया वो चली,हर पहर साथ है...!!
इंदर भोले नाथ....... आधुनिक हिंदी साहित्य से परिचय और उसकी प्रवृत्तियों की पहचान की एक विनम्र कोशिश : भारत
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